World Famous Sultanganj

Shravani (कांवर) Mela

सुल्तानगंज से देवघर की कांवर-यात्रा मात्र एक धार्मिक यात्रा ही नहीं वरन शिव और प्रकृति के साहचर्य की यात्रा है। कांवर-मार्ग में हरे-भरे खेत, पर्वत, पहाड़, घने जंगल, नदी, झरना, विस्तृत मैदान-सभी कुछ पड़ते हैं। रास्ते में जब बारिश की बौछारें चलती हैं तो बोल बम का निनाद करते हुए कांवरिया भक्तगण मानों भगवान शंकर के साथ एकाकार हो उठते हैं। देवघर में जल अर्पण करके लौटते समय न सिर्फ धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से अपने को परिपूर्ण पाता है, वरन प्रकृति के सीधे साहचर्य में रहने के कारण वह अपने अंदर एक नयी उर्जा और उत्फूल्लता महसूस करता है। आज के प्रदूषण के युग में अभी भी प्रकृति के पास मनुष्य को देने के लिये बहुत कुछ है- यह संदेश श्रावणी मेला की कांवर यात्रा देता है जो इसमें शामिल होकर ही महसूस किया जा सकता है। जल शांति, स्वच्छता और जीवन का प्रतीक है- शीतलता से भरा हुआ।

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भगवान शंकर पर जल का अर्पण हमें शांति और शीतलता का ही तो संदेश देता प्रतीत होता है। इस धार्मिक उन्माद के युग में आज निहित स्वार्थी तत्वों ने आडंबर और वृहत अनुष्ठानों की आड़ लेकर धर्म को धन-बल प्रदर्शन का साधन बना लिया है। वहीं श्रावण में शिव यह संदेश देते हैं कि मुझपर सिर्फ गंगा जल और बेलपत्र चढ़ाओ और वरदान में मुझसे जीवन की सारी ख़ुशियाँ ले जाओ। आज के मार-काट के दौर में भी बैद्यनाथ-धाम मंदिर से सटी दूकानों में हमारे मुसलमान भाई सुहाग की चूड़ियाँ बेचते हैं बाबा के रंग में रंगकर।

पवित्र जल हमें बाजार से दूर पुराण कथाओं, कहानियों, विश्वासों और श्रद्धा, संस्कृति तथा उत्सव की एक अभिभूत दुनिया में ले जाता है। इसी तरह की दुनिया का साक्षात्कार कराता है विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला। भागलपुर के सुल्तानगंज से कांवर लेकर चलते कांवरियों की संख्या करोड़ के आस-पास पहुँच गयी है। अनास्था की सदी में यह आस्था का मेला है। साथ ही पवित्र गंगाजल और शिव के प्रति समर्पण का अनुष्ठान है। क्योंकि कोई भी बाजार अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी संख्या में लोगों को पैदल नहीं चलवा सकती है। वे जल के मूल्य का आंकलन उसके बाजार भाव से नहीं, बल्कि इसके आध्यात्मिक आधार पर करते हैं। कोई भी राज्य श्रद्धालुओं को जल के बाजार की आराधना के लिए विवश नहीं कर सकता है।

शिवपुराण में भगवान भोले शंकर के महात्म्य की चर्चा करते हुए उल्लखित है कि जैसे नदियों में गंगा, सम्पूर्ण नदी में शोणभद्र, क्षमा में पृथ्वी, गहराई में समुद्र और समस्त ग्रहों में सूर्यदेव का विशिष्ट स्थान है, उसी प्रकार समस्त देवताओं में भगवान शिव श्रेष्ठ माने गये हैं। प्रत्येक वर्ष श्रावण के पावन महीने में लगने वाले विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला अवधि में सुल्तानगंज की महिमामयी उत्तर वाहिनी गंगा तट पर स्थित अजगैबीनाथ धाम से लेकर देवघर के द्वादश ज्योतिर्लिंग बाबा बैद्यनाथ धाम के करीब 110 कि.मी. के विस्तार में मानों शिव का विराट लोक मंगलकारी स्वरूप साकार हो उठता है और समस्त वातावरण कांवरियां शिव भक्तों के जयकारे से गूंजायमान रहता है।

भगवान शंकर, जो देवों के देव महादेव कहलाते हैं, के बारे में धार्मिक मान्यता है कि श्रावण मास में जब समस्त देवी-देवतागण विश्राम पर चले जाते हैं, वहीं भगवान भूतनाथ गौरा पार्वती के साथ पृथ्वी-लोक पर विराजमान रहकर अपने भक्तों के कष्ट-कलेश हरते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। ऐसी लोक-आस्था है कि श्रावण मास के दिनों में भगवान शंकर बैधनाथ धाम और अजगैबीनाथ धाम में साक्षात विद्यमान रहते हैं जहाँ उनकी अर्चना द्वादश ज्योतिर्लिंग और अजगैबीनाथ महादेव के रूप में होती है। यही कारण है कि औघड़दानी शिव के पूजन हेतु लाखों भक्त सुल्तानगंज अजगैबीनाथ धाम और देवघर बैद्यनाथ की ओर उमड़ पड़ते हैं। सुल्तानगंज में गंगा उत्तरवाहिनी है, जिसका विशेष महात्म्य है। भगवान शंकर को गंगा का जल अत्यन्त प्रिय है। यदि यह जल उत्तरवाहिनी का हुआ तो अति उत्तम। पौराणिक कथा के अनुसार यहां ऋषि जह्नु का आश्रम था। जब भगीरथ गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर ला रहे थे, तो कोलाहल से क्रोधित होकर ऋषि जह्नु ने गंगा का आचमन कर पी लिया। किन्तु बाद में भगीरथ के अनुनय विनय करने पर अपनी जंघा से गंगा को प्रवाहित किया जिसके कारण पतित पावनी गंगा जाह्नवी कहलायी।

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आनंद रामायण में वर्णित है कि भगवान श्रीराम ने सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा के जल से बैद्यनाथ महादेव का जलभिषेक किया था। और, चल पड़ा परिपाटी सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का जल कांवर में लेकर बाबा बैद्यनाथ पर अर्पित करने। श्रावण के महीने में सुल्तानगंज से देवघर तक करीब 100 कि.मी. के विस्तार में कांवरिया तीर्थयात्रियों के कांवरों में लचकती मचलती गंगा मानों बहती-सी जाती हैं- जैसे दो -दो गंगा बहती है श्रावण में- एक कांवरों में सवार होकर देवघर की ओर और दूसरी अविरल बहती हुई बंगाल की खाड़ी की ओर। ऐसा चमत्कार तो सिर्फ भगवान भोले शंकर ही कर सकते हैं। इतना ही नहीं, श्रावण मास में बारिश की रिम-झिम फुहारो के साथ-साथ बसंत ऋतु की अलौकिक छटा भी अजगैबीनाथ सुल्तानगंज और सम्पूर्ण कावंरियां-पथ पर देखने को मिलती है। सुल्तानगंज के मेले में लगी दूकानों में कांवरों में लगे प्लास्टिक के लाल, पीले, हरे, गुलाबी खिले-खिले फूल अनुपम दृश्य उपस्थित करते हैं- लगता है मानों सावन में बसंत का आगमन हो गया हैं। ऐसा तो सिर्फ शिव की कृपा से ही सम्भव है। श्रावण मास में सुल्तानगंज से बैद्यानाथ की कांवर-यात्रा मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, वरन इसके पीछे हमारी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक मान्यताएं भी छिपी हुई हैं। यदि हम पौराणिक संदर्भ लें तो वह कांवड़-यात्रा आर्य और अनार्य संस्कृतियों के मेल और संगम को दर्शाता है। कहाँ आर्य मान्यताओं की देवी गंगा और कहाँ अनार्यों के देव महादेव पर गंगा-जल का अर्पण आर्य और अनार्य संस्कृतियों के काल क्रम में हुए समागम को दर्शाता है। इसी तरह आर्यों के देव श्रीराम के द्वारा सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा को कांवर में लेकर बैद्यनाथ महादेव का पूजन इसी भाव को इंगित करता है।

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Milan Anshuman is a travel blogger with proficiency in nature and wildlife photography. Apart from this he loves to write article for technology, food, health & lifestyle, education, ayurveda and yoga.

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